लड़की चली लन्दन


र इंसान का एक सपना होता है .. मेरा भी है, छोटा सा सपना .. पूरी दुनिया की सैर करना .. हाँ - हाँ पता है, इतना भी छोटा सपना नहीं है लेकिन नामुमकिन भी तो नहीं .. ये मैंने जाना जब पहली बार अपने देश से बाहर घूमने निकली.  सोलोट्रिप.  मम्मी से कहा,  ‘मुझे लन्दन जाना है घूमने’ .. मम्मी ने कोई जवाब ही नहीं दिया. उन्हें पता था ये लड़की हर बार कोई नया शगूफा छोड़ देती है. लेकिन कहीं न कहीं उन्हें अंदाज़ा था की एक बार कुछ करने का कहेगी तो करके ही मानेगी. शायद इसीलिए उन्होंने इस बात का जिक्र पापा से किया. अगली ही सुबह पापा का फ़ोन आया और कहने लगे,  ‘सुना है तुम विदेश जा रही हो ?’  मैंने कहा,  ‘हाँ पापा सोच तो रही हूँ  ..’ अगला सवाल था,  ‘किसके साथ ..?’  मैंने कहा, ‘अकेले ..’ और मेरी उम्मीदों से एकदम उलट पापा ने कहा,  ‘जाओ और खूब एन्जॉय करके आओ. जब तक घूमने से पेट न भरे मत आना.’  मैं हैरान थी .. शायद एक अनमेरिड, इंडीपेंडेंट और सपने देखने वाली लड़कियों के माँ -बाप भी उन्ही की तरह सोचने लगते हैं. उसी वक़्त जोश में आकर मैं लैपटॉप के सामने बैठी और मुंबई से लन्दन का टिकट बुक कर लिया. अब पता थोड़े ही था की पहले टिकट नहीं वीजा अप्लाई करते हैं.  पहली फोरेन ट्रिप थी इसलिए एक्साइटमेंट  में कुछ गलतियां तो जायज़ है.  तो करवा ली १६ अगस्त की टिकट,  क्यूँकी वही सबसे सस्ती पड़ रही थी.  जाने में अभी २ महीने थे.  सोचा कर लुंगी वीजा अप्लाई आराम से.  प्लान था कि पहले लन्दन और उसके बाद योरोप घूम कर आउंगी. इसके लिए मुझे यूके और शेनेगन वीजा चाहिए था.  मेरे दोस्त कर्तिक के भैय्या से गाइडेंस ली. वो एक बड़ी कम्पनी में वीजा से रिलेटेड काम देखते हैं ... उन्होंने लिंक भेजा और कहा पहले युके वीजा का फॉर्म भर दो, वो आने के बाद शेनेगन वीजा अप्लाय करना और ज़रूरी डाक्यूमेंट्स बताये. जिसमें सबसे ज़रूरी था होटल बुकिंग दिखाना कि आखिर आप रुकने वाले कहाँ हो ? मगर बुकिंग तो मैंने की ही नहीं थी क्यूँकी मैं तो एक दोस्त के यहाँ रुकने वाली थी.  भैया ने कहा वीजा के लिए ७ दिन की बुकिंग करवा लो और चाहो तो बाद में कैंसल कर देना. तो मैंने एयरबीएनबी पर एक हफ्ते की बुकिंग कर ली जिसे कैंसल  करने पर ५० परसेंट पैसे कट जाने वाले थे. इसके अलावा पासपोर्ट नंबर, आपकी इनकम, आपकी आईटनेररी यानि की यूके में आप कहाँ कहाँ जाने वाले है और ट्रिप के दौरान आपका वहां कितना पैसा खर्च करने का प्लान है, ये सब फॉर्म में लिखना होता है. मेरी गाडी अटकी वहां जहाँ कंपनी का लेटर माँगा गया.  मैं ठहरी फ्रीलांस राइटर किस कम्पनी का लेटर दूं ? फिर से भैया को फ़ोन किया. उन्होने कहा कि इसके लिए तुम्हे कवर लेटर देना होगा कि तुम राइटर हो और वहां घूमने जा रही हो. मैंने वो भी लिखा. वैसे अगर कोई दोस्त और रिश्तेदार वहां हो जहाँ आप घूमने जा रहे हैं तो उनसे स्पोंसर लेटर भी लिया जा सकता है. वीजा मिलने में थोड़ी आसानी होती है. स्पोंसर लेटर मतलब एम्बेसी में एक तरह का अश्योरेंस देना की आप इतने दिनों के लिए फलां दोस्त या रिश्तेदार के यहाँ रुकने वाले हो. ताकि अगर आपके मन में गलती से भी इमिग्रेंट बनने का ख्याल आ जाये और आप वही रुक जाओ तो सरकार उस दोस्त या रिश्तेदार के ज़रिए आपको ढूंढ निकाले. लेकिन किसी से स्पोंसर लेटर का मामूली अहसान लेना मुझे ठीक नहीं लगा. खैर, टूरिस्ट वीजा के लिए ओनलाइन फॉर्म भरा और २ दिन बाद का वीऍफ़एस ऑफिस का अपोइन्टमेंट मिला जहाँ आपको जाकर सभी डोक्युमेन्ट्स जमा करने होते हैं.  सुबह ९ बजे का अपोइनटमेंट और बारिश इतनी की रुकने का नाम ही न ले. नींद में सोचा कौन जाये ? फ़ोन करके दोबारा टाइम ले लुंगी .. बस ... यहीं गलती कर दी .. क्यूँ की वीऍफ़एस ऑफिस में फोन करके अपॉइंटमेंट नहीं मिलता .. ऑनलाइन ही टाइम चेंज करने की रिक्वेस्ट देनी होती है वो भी तय डेट से पहले .. और आप दिए गए टाइम पर नहीं पहुचे तो आपको फॉर्म के साथ साथ फिर से लगभग ९ हज़ार रुपये की फीस भी भरनी होती है ..अगर आपने नहीं पहुच पाने की वेलिड वजह दे दी तो आपको पैसे वापस मिल जायेंगे .. वरना भूल जाओ ..  बात भी सही है वो लोग आपकी सेवा में थोड़े ही बैठे हैं की दिन रात आपकी सहूलियत के हिसाब से आपको आने का टाइम दें.  


तो इज्ज़त से मैंने दोबारा फॉर्म भरा और फीस भी और इस बार समय से आधा घंटा पहले वीजा ऑफिस पहुच गयी तमाम डाक्यूमेंट्स के साथ. डाक्यूमेंट्स और पासपोर्ट वहां जमा हो गए और कहा गया की २० वार्किंग डेज में जवाब आ जायेगा कि  वीजा अप्रूव हुआ या रिजेक्ट.  अब जाने में तो सिर्फ ३० दिन थे अगर २० दिन बाद इनका जवाब आया तो शेनेगन वीजा कब अप्लाई करुँगी ? और इस तरह योरोप जाने की प्लानिंग मुझे केंसल करनी पड़ी. सोचा कोई बात नहीं घूमने से मतलब है, यूके घूम आउंगी  लेकिन अभी तो और दो बम फूटने बाकी थे. भैया को कॉल किया और बताया कि, ‘डाक्यूमेंट्स जमा हो गए हैं आप बताओ कब तक आ जायेगा मेरा वीजा ? ताकि मैं शौपिंग शुरू करू. जुलाई की सेल भी चल रही है ..’  उन्होने कहा तुम्हारा वीजा होने का चांस ५०-५० है ’  मुझे झटका लगा .. मैंने पुछा, ‘क्यूँ ?’ तो उन्होंने बताया, ‘यूके में इम्मिग्रेंट्स बहुत बढ़ गए हैं अक्सर वहां लोग टूरिस्ट वीजा पर जाते है और वही रह जाते हैं  ...एक तो तुम सेल्फ एम्प्लोयड हो .. दूसरी तुम यंग लड़की हो और वो भी सिंगल. उन्हें लग सकता है की तुम वही किसी से शादी करके रह जाओगी. ऐसे में हो सकता है वो तुम्हारा वीजा अप्रूव न करें’.  मैंने सपने में भी नहीं सोचा था की सिंगल होना सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि विदेश जाने के लिए भी ट्रेजेडी साबित होगी.  शौपिंग के सारे प्लान धरे के धरे रह गए. सोचा जब वीजा आ जायेगा तब ही तैयारी शुरू करुँगी. तैयारी करने के बाद अगर वीजा रिजेक्ट हुआ तो तकलीफ की तीव्रता थोड़ी ज्यादा हो जायेगी.  दूसरा बम फूटना अभी भी बाकि था. मेरे दोस्त गौरव का फ़ोन आया जिसके भरोसे मैं लन्दन जा रही थी. करीब ढाई साल पहले उससे मेट्रीमोनी साईट के ज़रिये बातचीत शुरू हुई थी. बात शादी तक तो नहीं पहुच सकी लेकिन दोस्ती पक्की वाली हो गयी. उसने कहा की वो १३ अगस्त को ही लन्दन से हमेशा के लिए जा रहा है क्यूँकि उसे युएस में नयी जॉब ज्वाइन करनी है. मन हुआ कि कह दूं, ‘तुम तो जा रहे हो अब मेरा क्या होगा ..?’  लेकिन एक इंडीपेडेंट लड़की ये कहेगी तो अच्छा भी नहीं लगेगा. सोच कर चुप रह गयी. पूरी रात मैं सो नहीं पाई. इसी डिलेमा में की जाऊ या ना जाऊ ? सब कुछ वहां अकेले कैसे मेनेज करुँगी ? फिर सोचा मेरा मकसद तो घूमना है न. किसी के भरोसे रहकर ज़िन्दगी में कुछ नहीं किया जा सकता और तय किया कि अगर वीजा आ गया तो मैं जाउंगी.
फाइनली वीजा ऑफिस से मुझे मेल आया. अगले दिन मुझे अपना पासपोर्ट लेने जाना था. आज सस्पेंस ख़त्म होने वाला था की मेरे सपनो पर वीजा का ठप्पा लगा या नहीं. वहां पहुची तो मेरे हाथ में एक एन्वेलप दे दिया गया जिसमे मेरा पासपोर्ट और वो सारे डाक्यूमेंट्स थे जो मैंने जमा करवाए थे. पासपोर्ट खोल कर देखा तो मेरा ६ महीने का टूरिस्ट वीजा अप्रूव हो चुका  था. लेकिन जर्नलिस्ट रहते हुए एक आदत लग चुकी थी .. हर बात को रीकंफर्म करना .. तो वही के ऑफिसर को पासपोर्ट देते हुए पुछा .. मेरा वीजा अप्प्रूव हो गया न ? वो मुस्कुराया और कहा .. हाँ आप यूके जा सकती हैं.  वो भी समझ गया था की ये मेरा पहला वीजा है.  मैं खुश थी और तुरंत पापा को फ़ोन किया फिर अपने करीबी दोस्तों को. बधाइयो की लाइन लग गयी थी. कहीं न कहीं सब लोग मेरी ख़ुशी में शामिल थे. जाने में सिर्फ १० दिन बचे थे और उन दस दिनों में मुझे महीने भर का काम ख़त्म करना था और जाने की तैयारी भी. क्यूँ की मैं तो सोच कर बैठी थी की वीजा नहीं होगा. जैसे तैसे १० दिनों में अपना काम ख़त्म किया और आखिरी दिन पैकिंग. इस भागदौड़ में रिसर्च करने का टाइम ही नहीं मिला. बस इतना पता था की यूके में लन्दन, लीड्स,  स्कॉटलैंड और शेक्सपियर के बर्थप्लेस स्ट्राटफ़ोर्ड अपॉन एवोन ज़रूर जाउंगी. फेसबुक के ज़रिये पता चला की एक करीबी दोस्त कुछ महीनो के लिए लन्दन के पास ही स्लोव में है और लीड्स में मेरी एक कजिन. मैंने अपने आने की इन्फोरमेशन उन्हें दे दी थी.
१५ अगस्त की रात १२ बजे मुझे निकलना था क्यूँ की फ्लाइट १६ अगस्त सुबह ४ बजे की थी. पहली इंटरनॅशनल ट्रिप थी तो २-३ घंटे पहले एअरपोर्ट पहुचने में समझदारी थी. १२ बजे मेरे कुछ कारीबी दोस्त मेरे घर पर थे. मुझे एअरपोर्ट ड्राप करने के लिए. जब आपकी फॅमिली आपके पास न हो तो दोस्त ही परिवार का फ़र्ज़ अदा करते हैं. मुझे तिलक लगाया गया और शगुन का दही गुड भी खिलाया गया. कुछ मेरे साथ बैठे कुछ दूसरी कार में.  पूरे लाव लश्कार के साथ मैं एअरपोर्ट जा रही थी. ऐसा लग रहा था गोया मैं कोई राइटर नहीं नेता हूँ.  दोस्तों ने एअरपोर्ट पर बिदाई दी. वो अपने घर की तरफ जा रहे थे और मैं अपना बेगपैक लेकर अकेली ... आज़ाद ... एक अनजान देश की तरफ ...
To be continued ….


Comments

  1. Good information loaded for a first timer. Hopefully you learnt your lesson. Hamesha ki tarah pele kaam karke fir sochte ho. Waiting for your baki ki kahani........

    ReplyDelete

Post a Comment